शोभना सम्मान-2012

Thursday, December 6, 2012

अंग्रेज़ सेनाशाही क्षत्रिय समाज के पाँव उखाड़ने में यत्नशील हो गयी


   ए. ओ. ह्यूम सन् 1882 में जब सरकारी सेवा से मुक्त हुए तो अपने सेवा-काल में प्राप्त अनुभवों पर विचार करने लगे। उनका जीवन चरित्र लिखने वाले सर विलियम वडरबर्न उनके अनुभवों के
 विषय में इस प्रकार लिखते हैं—

‘सेवा-मुक्त होने से कुछ पहले ह्यूम के पास ऐसे प्रमाण एकत्रित हो गये थे कि जिनसे उसे विश्वास हो गया कि हिन्दुस्तान में एक गम्भीर, स्थिति उत्पन्न हो चुकी है, जिसका अति भयंकर परिणाम निकल सकता था महान् भय के प्रमाण जो उसे मिले, वह सात वृहत्ख ण्डों में रखे गये थे। उन प्रमाणों में लगभग तीस सहस्र सूचनाएँ सम्मिलित हैं।

इन सात खण्डों में साधु-सन्त, महात्माओं क्षत्रिय राजाऔ और उनके कर्मचारियों के लिखे पत्र हैं, जो देश के धार्मिक एवं रातनेतिक नेता थे।उनका अविश्वास नहीं किया जा सकता था।इन प्रमाणों की उपस्थिति में सर वडरबर्न लिखते हैं—
Hume felt that a safety valve must be provided for the suppressed discontentment of the masses and something must be done to relive their despair, if a disaster was to be averted………
(ह्यूम यह अनुभव करता था कि जनता में दबे हुए असन्तोष को निकलने का स्थान होना चाहिए। उनकी निराशा को दूर करने का कुछ यत्न करना चाहिए, जिससे भारतीयों का भयंकर विद्रोह और दुर्घटना होने से रोकी जा सके।)

सर ह्यूम सरकारी नौकरी में सन् 1849 में आये थे और सन् 1882 में सेवा-मुक्त हुए थे। वे हिन्दुस्तान के उस ऐतिहासिक काल में भारत सरकार में रहे थे, जिसमें सन् 1857 का अंग्रेज़ी राज्य के विरुद्ध भयंकर विद्रोह हुआ था और उस विद्रोह के उपरान्त अंग्रेज़ सेनाशाही ने उस विद्रोह में समलित क्षत्रिय राजा और जनता से भीषण प्रतिशोध लिया था। उस काल के अनुभव ही ह्यूम के मस्तिष्क पर बोझा बने हुए प्रतीत होते हैं। परन्तु जो कुछ ह्यूम को अपने सेवा-काल में विदित हुआ था, वही कुछ मैकॉले और उसके समान विचार वाले अंग्रेज़ विद्वानों को पहले ही अनुभव हो चुका था। उन्होंने भी भारत के प्रशान्त सागर की तह के नीचे गहराई में एक प्रबल धारा बहती देखी थी और उन्होंने इस धारा को दबा देने का प्रयत्न अपने ढंग से किया था।

इस प्रतिशोध के स्वरूप की दिशा बदलने की कोशिस दो प्रकार से की गई एक ओर राजा राममोहन राय की ब्रह्म-समाज के रूप में, तथा दूसरी ओर मैकॉले साहब की सरकारी शिक्षा के रूप में। इसी विरोध का एक अन्य रूप उत्पन्न हुआ, सर ह्यूम द्वारा स्थापित इण्डियन नैशनल कांग्रेस। क्षत्रिय समाज की गहराई में चल रही इस धारा को अंग्रेज़ विद्वानों ने देखा और समझा था। वह धारा थी भारतीय संस्कृति और धर्म की, जिसे लम्बा मुसलमानी राज्य भी मिटा नहीं सका था।

अंग्रेज़ी शासन के बंगाल में स्थापित होते ही, अंग्रेज़ विद्वान अधिकारियों को यह जानने की चिन्ता सताने लगी थी कि जो कुछ इस्लामी राज्य मोराकों से अफ़गानिस्तान तक कुछ ही वर्षों में सम्पन्न कर सका था, वह हिन्दुस्तान में अपने सात सौ वर्ष के राज्य-काल में क्यों नहीं कर सका ? उनकी खोज का यह परिणाम निकला कि यह भारत की प्राचीन संस्कृति और धर्म की धारा थी, जिसे क्षत्रिय थामे हुए थे जो इस्लाम के यहाँ असफल होने में कारण बनी। इसको विनष्ट करने में ही अंग्रेज़ सरकार को अपनी भलाई दिखाई देने लगी थी।

यह ठीक है कि राजा राममोहन राय के विचार पूर्वोक्त अंग्रेज़ों के कहने से नहीं बने थे। वे उनके अपने बाल्यकाल में मुसलमानों से सम्पर्क के कारण बने थे। साथ ही ये विचार बने थे ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ के सेवा-काल में उनके एक योग्य अंग्रेज़ अधिकारी की संगत से। राजा साहब ने उपनिषदादि ग्रंथों का अपने विशेष दृष्टिकोण से अध्ययन भी किया था, परन्तु जब उनके विचार ब्रह्म-समाज में मूर्त होने लगे तो

अंग्रेज़ी सरकार को राजा राममोहन राय अपनी योजना के अनुकूल प्रतीत हुए। उन्हें वे उस तरंग की सहायता करते प्रतीत हुए, जिससे सरकार भारतीय सांस्कृतिक धारा का विरोध करना चाहती थी। अतः सरकार इसमें सहायक होने लगी। ब्रह्म-समाज की स्थापना सन् 1828 में हुई थी। ब्रह्म-समाज का स्वतंत्रता के लिए अत्यन्त प्रेम होने पर भी उन्होंने ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा ऊँचा नहीं किया।)

अंग्रेज़ नीतिज्ञों को कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि यह ब्रह्म-समाज भी उस गहराई में चलने वाली धारा का एक प्रकार से विरोध ही कर रही है। अतः ब्रह्म-समाज को उनका समर्थन और सहायता प्रस्तुत हो गई और सन् 1828 से लेकर, हिन्दुस्तान में ब्रिटिश राज्य के अन्त काल तक, यह उनको प्राप्त रही। इसी प्रकार की मैकॉले की सरकारी शिक्षा की योजना थी। मैकॉले ने एक समय अपने पिता को एक पत्र में लिखा था—

The effect of this education on the Hindoos is prodigious. No Hindoo, who has received our English education, ever remains sincerely attached to his religion.

(इस शिक्षा का हिन्दुओं पर प्रभाव आश्चर्यजनक होगा। कोई भी हिन्दू, जिसने यह अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त कर ली है, कभी भी निष्ठापूर्वक अपने धर्म से सम्बद्ध नहीं रह सकता।)

ब्रह्म-समाज 1828 में स्थापित हुई। अंग्रेज़ी सरकारी शिक्षा 1835 में आरंभ हुई और ह्यूम साहब की इण्डियन नैशनल कांग्रेस सन् 1885 में स्थापित की गई। तीनों तरंगे जान-बूझ कर अथवा अनजाने में हिन्दू-समाज की आभ्यान्तरिक सांस्कृतिक धारा को नाश करने में संलग्न रहीं। जितना-जितना इनका बल बढ़ता गया, सांस्कृतिक धारा का विरोध, ये उतने ही बल से करती रहीं। वहीं एक ओर बाहरी यूरोपीय बुद्धिवाद ने, और दूसरी ओर ईसाईयत ने,जो देश में विदेशीय साम्राज्यवाद के साथ आया था और यहाँ की समाज में फूट डलवा रहा था, भारतीय परिवार पर आक्रमण कर, यहाँ के मज़हब को विनष्ट कर दिया था जिसे सुधार करने वाली सस्था ब्रह्म-समाज से सर्वथा विपरीत आर्य-समाज थी। यह संघर्षमयी संस्था थी। हिन्दुओं के भीतर इसका स्थान वही था, जो प्रोटैस्टैण्ट समुदाय को रोमन कैथॉलिक के प्रति था। यह पुनरुद्धार करने वाला आन्दोलन था। यह पुनः प्राचीन वैदिक मत को, इसकी सभ्यता और रीति-रिवाज को चाहता था।) यही अंग्रेज़ नीतिज्ञ नहीं चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि विचारों के वे तत्त्व जीवित और जाग्रत रहें, जिन्होंने इस्लाम जैसे बलशाली समुदाय का मुख मोड़ दिया था। अतः पूर्ण अंग्रेज़ी सरकार, इसका विरोध करने पर उद्यत हो गई।

भारतवर्ष में क्षत्रियों के साथ विशाल हिन्दू-समाज, जिसके पाँव दृढ़ता से अपनी प्राचीन संस्कृति और धर्म में जमे थे काल की विपरीत गतियों का सफलतापूर्वक सामना करता चला आया था। भारतवर्ष पर गिद्ध-सी दृष्टि रखने वाले विदेशी ,क्षत्रिय समाज के पाँव उखाड़ने में यत्नशील हो गये। एक दूषित संयोग, इस्लाम, ईसाईयत और अंग्रेज़ी शिक्षा-प्राप्त आस्था-विहीन हिन्दुस्तानी घटकों का बन गया और इस संयोग का विरोध करने के लिए आर्य-समाज हिन्दू-समाज की कायाकल्प करने की चेष्टा करने लगी।

द्वारा - श्री भूपेंद्र सिंह चौहान 



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